Matsaya Puran

Front Cover
Diamond Pocket Books Pvt Ltd - 150 pages

पुराण साहित्य भारतीय साहित्य और जीवन की अक्षुण्ण निधि है। इनमें मानव जीवन के उत्कर्ष और अपकर्ष की अनेक गाथाएं मिलती हैं। अठारह पुराणों मे अलग- अलग देवी- देवताओं को केन्द्र में रखकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएं कही गई हैं। इस रूप मे पुराणों का पठन और आधुनिक जीवन की सीमा में मूल्यों की स्थापना आज के मनुष्य का एक निश्चित दिशा दे सकता है।

निरन्तर द्वन्द्व और निरन्तर द्वन्द्व से मुक्ति का प्रयास मनुष्य की संस्कृति का मूल आधार है। पुराण हमें आधार देते हैं। इसी उद्देश्य को लेकर पाठकों की रुचि के अनुसार सरल, सहज भाषा मे प्रस्तुत है पुराण- साहित्य की श्रृंखला में ‘मत्स्य पुराण’।

 

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Section 1
Section 2
Section 3
Section 4
Section 5
Section 6
Section 7
Section 8
Section 9
Section 10
Section 11
Section 12
Section 13
Section 14

Other editions - View all

Common terms and phrases

अनेक अपना अपनी अपने आदि आप आिद इं इन इस इसके उत्पन्न उनके उस उसका उसके उसने उसे उह उहने एक ओर और कर करके करता करना करने करने के करें कहा िक का कार कि किया की कुछ के कारण के पास के बाद के लए को कोई गई चाहिए चािहए जब जाने जो तक तथा तप तब तीन तुम तो था थे दंड दान दानव दिया देखकर देव देवता देवताओं दैय धारण नह नहीं नाम ने ने कहा प म पर पु पुत्र पुराण प्रकार बहत बात बोले ब्रह्मा भगवान नारायण भी मत्स्य मय मुझे में यम यह यहां यु रहे राजा रूप में लगा लगे लया लिए लेिकन लोग वह वाला वाले विष्णु वे शंकर शर्मिष्ठा शिव सभी समय समान सुनकर से हं हआ ही हुआ हुए हे है है और हैं हो गया होकर होने ाजी िकया िदया िफर िशवजी

About the author

 

Bibliographic information